साहित्य प्रतिभा

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Monday, 27 February 2017

गज़लकार दुष्यंत कुमार की गज़लों में व्यंग्य की तेज-तर्रार धार ... प्रा.विजय लोहार, सहायक प्राध्यापक, मूलजी जेठा महाविद्यालय, जलगाँव. --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- “ दोस्तों !अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है||” १ - दुष्यंत कुमार हिंदी गज़ल विधा के सिरमौर दुष्यंत कुमार की गज़लों में व्यंग्य का दीर्घ स्वर गुंजायमान है| उनकी गज़लें अपने समय के वास्तव से रू-ब-रू करवाती है | व्यंग्य उनकी गज़लों में विशेष आकर्षण निर्माण करता है| वस्तुतः ‘व्यंग्य’ के द्वारा एक रचनाकार मानव और उसके समाज में परिव्याप्त विसंगतियों, विरूपताओं तथा पाखंड का पर्दाफाश करता है| व्यंग्य प्रतिबद्धता का लेखन माना गया है | वह व्यवस्था के प्रतिरोध का असरदार तरीका है| सत्य की अभिव्यक्ति का सटीक मार्ग है | व्यंग्य में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक दोषों को कोई रचनाकार बिना किसी लाग लपेट के मगर तिक्त शब्दों में किसी आईने-सा स्पष्ट कर देता है | व्यंग्य की सबसे तेज-तर्रार और पैनी धार हिंदी गज़लों में दुष्यंत कुमार में प्राप्त होती है | सर्वाधिक मारक एवं परिणामकारक व्यंग्य उनकी ग़ज़लों की प्रमुख विशेषताओं में से एक हैं| स्वातंत्रोत्तर भारतीय परिवेश की दस्तक को दुष्यंत कुमार बड़े संजीदगी के साथ पर व्यंग्य की भाषा में उभारते हैं| उनके भीतर का सजग नागरिक बार-बार व्यवस्था से सीधे-सीधे सवाल पर सवाल करता हैं| शोषण, दीनता, उत्पीडन और वैषम्य दुष्यंत को बहुत गहरे तक कुरेदते हैं| जिसका प्रतिबिंबन उनकी गज़लों में स्पष्टतया देखा जा सकता हैं| डॉ.संतोषकुमार तिवारी लिखते हैं-“ दुष्यंत की मानवीय प्रतिबद्धता प्रारंभ से ही बहुत प्रखर रही है और ‘साये में धूप’ तक वह व्यंग्य की धार बहुत ही पैनी कर चूका है | उनकी गज़लों में शोषण,पराजय, दैन्य, उत्पीडन और दुर्व्यवस्था की निर्भीक अभिव्यक्ति है |” २ दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल संग्रह ‘ साये में धूप ’ हिंदी ग़ज़ल की दुनिया को मिला हुआ नायाब तोअफा है |उसे विद्वानों ने हिंदी ग़ज़ल के मिल का पत्थर माना है | दुष्यंत कुमार वैसे तो नयी कविता के प्रमुख कवियों में से एक माने जाते रहे हैं| परन्तु दुष्यंत कुमार नयी कविता की रूटीन कथ्य बयानी और शिल्प की बोझिलियत से उब- से गए थे| वे अपने भीतर पहले से ही एक शदीद और दुहरी पीड़ा को महसूस कर रहे थे| दुष्यंत अपने समय की तकलीफ़ से जूझ रहे थे, जिसकी अभिव्यक्ति ग़ज़ल जैसी कोमल पर बहुत ही प्रभावी माध्यम से संभव थी | अतः उन्होंने ग़ज़ल लेखन की प्रचलित परिपाटी से हटकर कथ्य की दृष्टि से आम आदमी का जीवन, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं तथा राजीनीतिक विद्रूपताओं को गज़लों में अभिव्यक्त किया| उन्होंने ही हिंदी ग़ज़ल को व्यापक अर्थों में आम आदमी के जीवन से संपृक्त किया है | कमलेश्वर जी ने लिखा है, “ दुष्यंत ने गज़लों को रूमानियत की आदिम गुफाओं से निकालकर सीधे आम आदमी की जिंदगी से जोड़ दिया |” ३ आम आदमी की जिन्दगी झुनझुने-सी बन गई थी, जिसे कोई भी, किसी भी सभा में जैसे चाहे वैसे बजा रहा था | उसका प्रतिरोध दुष्यंत ने अपनी गज़लों द्वारा किया | उनकी बहुतायत गज़लों की अभिव्यक्ति में व्यंग्यरूपी औजार का प्रयोग हुआ है | एक शायर ही देखता है, कहकहों की असलियत हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होती नहीं | बहरहाल, अंतस और बाहरी दोनों तकलीफों को व्यक्त करते-करते उनका कथन बहुत जगहों पर व्यंग्यमय बन गया है| उनका व्यंग्य अभिव्यक्ति कौशल एक प्रतिबद्ध गज़लकार का कौशल है| उनकी प्रतिबद्धता किसी सियासी माहौल से नहीं थी, तो आम इंसान से थी| उनका ग़ज़ल लेखन आम आदमी की रोजमर्रा के जीवन से संबद्ध रहा है | उनकी हर ग़ज़ल आम आदमी की पीड़ा से आप्लावित है| वे कहते भी हैं- “ मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ , हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है ||” ४ दुष्यंत की गज़लों में हिंदुस्तान की दीन-हीन दशा और उसमें बसने वाले करोड़ों आम लोगों की जद्दोजहद का यथार्थ चित्रण मिलता हैं| आज़ाद भारत का मोहभंग उनकी अनेक गज़लों का मजमून बना है | यहाँ साँस लेता हुआ हर व्यक्ति आज़ाद भारत का आज़ाद नागरिक है| देश की आज़ादी अनेक ख्वाबों की सौगात लेकर आई थी | विकास के सपने, गरीबी निर्मूलन के सपने, रोटी-कपड़ा-मकान की आपूर्ति के सपने, सांप्रदायिक सद्भाव के सपने ऐसे कितने ही सारे सपने आँखों में लिए आम आदमी जी रहा था | परन्तु इन सपनों को जल्द ही चकनाचूर होते हुए उसने अपनी स्वप्निल आँखों से देखा | जिससे कि, मनुष्य से प्रतिबद्धता रखने वाला दुष्यंत-सा रचनाकार गहरे तक बेचैन हुआ, उसने व्यंग्य शर को अधिक पैना कर लिखा – “ इस कदर पाबन्दी-ए-मजहब कि सदके आपके, जब से आज़ादी मिली है मुल्क में रमजान है || कल नुमाईश में मिला था वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है||” ५ आज़ादी के बाद हमें एक खुशगवार सफ़र का हक़दार माना गया | लेकिन आज़ाद भारत के मौजूदा हालात के कारण आम-आदमी का जीवन बद से बदतर होता गया | हर जगह विकास की रोशनी होगी, हर घर संपन्न होगा ऐसा बताया गया, मगर हुआ कुछ यों- “ कहा तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए || कहा चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए || न हो कमीज तो पावों से पेट ढँक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए||” 6 मानवता के पक्षधर दुष्यंत ने मानव मूल्यों के विघटन पर असंतोष भी व्यक्त किया है | वे समाज में घटित रोज की अमानवीय हरकतों से आहत होते, उन कारणों की मीमांसा करते रहते| जब उन्हें आदमियों की भीड़ में एक भी कद आदमकद नहीं मिलता, तो जिंदगी का क्या मकसद है ? ऐसा सवाल अपने आप से पूछ बैठते हैं| समाज में आदमी को भुनकर खाने वाली तहजीब की बढ़ोतरी और नालियों में पाए जाने वाले कमल-से कुम्हलाये फूलों (नन्हें बच्चों) को जब देखा गया तो दुष्यंत ने गालियों में ही असर महसूस किया | “ होश में आ गए कई सपने, आज हमने वो खंडहर देखा || नालियों में हयात देखी हैं, गालियों में बड़ा असर देखा ||” ७ उनकी अनेक गज़लों में सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की चाहत व्यक्त हुई है | सांप्रतिक परिवेश की विकृतियों से दुष्यंत बेखबर नहीं थे | समाज का वातावरण किसने मटमैला कर दिया है, इसकी उन्हें पूरी समझ थी| देश के वर्तमान परिस्थितियों की भयावहता उन्हें कचोटती रहती थी | दुर्व्यवस्था, अभाव और शोषणरूपी अंगारों की तासीर को वो अनुभूत कर रहे थे | ऐसे में, देश की सूरत को बदलने के लिए कोई हंगामा खड़ा करना वाजिब था, क्योंकि ऐसे गुजर होने वाली नहीं थी | यह पीर हिमालय सी विशाल बन चुकी थी, अब आवश्यकता थी तो बस परिवर्तन रूपी गंगा निकलने की| दुष्यंत की गज़लों से वह बदलाव की गंगा निकली है | उनका मानना है कि, व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है, बस जरुरत है क्रांति का एक पत्थर कोई तबियत से उछाले |आम आदमी ने भी अपने अधिकारों के लिए शिद्दत से संघर्ष करना चाहिए| अपनी समस्याओं को खुद ही सुलझाना चाहिए| क्योंकि देश के हुक्मरान तो दिल्ली में बैठकर चर्चाओं की दंगल में उलझे हुए हैं | ये लोग तो सियासी दांवपेंचों में देश की अस्मत तक को नीलाम कर रहे हैं| मनसा-कर्मणा कीचड़ से सनी राजनीति पर दुष्यंत सटीक व्यंग्य करते हैं- “ इस सडक पर इस कदर कीचड़ बिछी है, हर किसी का पांव घुटनों तक सना है|| पक्ष औ’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर है, बात इतनी है कि कोई पुल बना हैं ||” ८ सियासतगर्द रहनुमाओं की अदा पर जो दुनिया फिदा है, उसे संभालने की बात दुष्यंत करते हैं| आम आदमी तक सरकारी योजनाएँ पहुंचती नहीं, उसपर भी कुठाराघात करते हैं| यहातक कि,तत्कालीन प्रधानमत्री पर नुकीले व्यंग्य कसते हैं | दुष्यंत जो भी कहते है सच कहते हैं उन्हें रो-रोकर बात कहने की आदत नहीं है | भूख है तो सब्र कहाँ तक करे? क्योंकि जिस दिल्ली ने भूख को बढ़ाया है, वहां पर आदमी के भूख पर हल ढूंढा जा रहा है| आप कितना भी गिडगिडायें पर इनपर असर तो होने वाला नहीं | दुष्यंत आम आदमी को एक नुस्का बताते हैं- “ भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ || आजकल दिल्ली में हैं जेरे बहस ये मुददआ || गिडगिडाने का यहाँ कोई असर होता नहीं, पेट भरकर गालियाँ दो,आह भरकर बद्दुआ ||” ९ दुष्यंत कुमार सभी प्रकार की विषमताओं पर शुब्ध है | फिर वह व्यक्तिगत हो, समाजगत हो, जाति-धर्मगत या अर्थगत इन विषमताओं ने मानव जीवन को दूभर कर रखा है | सिद्धांतहीनता और प्रलोभनवृत्ति के कारण समाज का एक वर्ग वैभव के शिखर पर है तो दीनता-लाचारी के कारण एक वर्ग तंगहाल जिन्दगी बसर कर रहा है| परिस्थिति यह है कि, यहाँ जो वास्तविक हकदार थे वो बाजारों में लुट गए और सारे तमाशबीनों ने दुकाने लगा ली हैं| ऐसे में, दुष्यंत-सा गज़लकार व्यंग्य की जुबान में सच्चाई बयान करता है - “ ऐ रोशनी है हकीकत में एक छल लोगों|| जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों || दरख़्त हैं यहाँ तो परिंदे नज़र नहीं आते, ओ मुस्तहक हैं, वहीँ हक़ से बेदखल लोगों ||” १० दुष्यंत इन विषम नजारों का अँधा तमाशबीन नहीं है| उन्होंने व्यक्ति की दोहरी यातनाओं को भोगा हैं | उनका खून इन विरूपताओं को देखकर खौलता है| अनेक प्रकार के तनाव विभिन्न स्तरों पर महसूस करते हुए उन्होंने व्यंग्य का सहारा लिया है | डॉ.संतोषकुमार तिवारी जी ने लिखा है, “दुष्यंत की संवेदनाएं जन-मन में डूबी हुई है |इसलिए वह सामाजिक अस्तित्व से जुडा हुआ है, आत्मकेंद्रित और अहंनिष्ठ नहीं है |उसमें दिखाऊ आक्रोश और काव्याडंबर नहीं है, बल्कि इंसानी तकलीफों की अभिव्यक्ति की छटपटाहट है |” ११ देश-समाज के साथ ही घर-घर की कहानी को दुष्यंत अभिव्यक्त करते हैं | लोगों के चलन कितने बदल चुके हैं इसका उन्हें पूरा अंदाजा है| वे जब भी रोशनी में आते रहे तो हर तरफ एतराज होता था, क्योंकि इस ग़ज़ल के बन्दे पर किसी सियासी खुदा की इनायत नहीं रही |अपनी एक ग़ज़ल में समकालीन सियासी अदबों (साहित्यकारों) पर और देश बदहाली पर व्यंग्य कसते हैं| “ तुम्हीं से प्यार जताए, तुम्हीं को खा जाए, अदीब यों तो सियासी हैं, पर कमीन नहीं || बहुत मशहूर है आए ज़रूर आप यहाँ, ये मुल्क देखने लायक तो है, हसीन नहीं ||” १२ उक्त विषयों के अलावा उन्होंने व्यक्ति की नैतिक कमियां, सांप्रदायिक विद्वेष, आधुनिक जीवन का भद्दापन तथा सांस्कृतिक अधःपतन आदि पर भी व्यंग्य किया हैं| सारतः स्पष्ट होता है, दुष्यंत की गज़लों में ऐसे कितने ही शेर और अशआर मिल जाते हैं, जिसमें व्यंग्य की तेज-तर्रार धार को देखा जा सकता है | उनकी गज़लें संख्या में काफी कम है, पर है बड़ी असरदार | उन्होंने अनेक विषयों को ग़ज़लों का कथ्य बनाया है| उनमें से अधिकांश गज़लों में व्यंग्य का सफल प्रयोग किया गया है| दुष्यंत प्रतिबद्ध कलमकार थे, न कि काव्याडंबर के निर्माता | उनकी कलम से समय की सच्चाई अंकित हुई | जहाँ भी विसंगती देखी दुष्यंत ने अपनी ग़ज़ल में उसे व्यंग्य प्रहार से लताड़ा | समाज और राजनीति के नंगेपन को खुलकर उघाडा | उनका अपने समय के वास्तव से दो-दो हाथ करना भी उल्लेखनीय विषय है| वे साहसी गज़लकार माने जाते थे| लोग जहाँ अपनी बात करके निष्प्रभ हो जाते, वहां दुष्यंत का क्रांतदर्शी ग़ज़लकार सामने आता ... “ वे मुतमईन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेक़रार हूँ आवाज में असर के लिए ||...... सन्दर्भ :- १) साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृष्ठ संख्या-२७ | २) हिंदी ग़ज़ल:सन्दर्भ और सार्थकता: लेख-डॉ.संतोषकुमार तिवारी, संपा. डॉ.वेदप्रकाश अमिताभ, डॉ.बादामसिंह रावत, पृ.संख्या-११७ | ३) घर का पता, भूमिका- सारिका संपा.कमलेश्वर से उद्धृत | ४) साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृष्ठ संख्या -५७| ५) वहीं | ६) वहीं, पृष्ठ संख्या -१३ | ७) वहीं, पृष्ठ संख्या - ३६ | ८) वहीं, पृष्ठ संख्या - २७ | ९) वहीं, पृष्ठ संख्या - २१ | १०) वहीं, पृष्ठ संख्या- २९ | ११) हिंदी ग़ज़ल:सन्दर्भ और सार्थकता: लेख-डॉ.संतोषकुमार तिवारी, संपा.डॉ.वेदप्रकाश अमिताभ, डॉ.बादामसिंह रावत,पृ.संख्या-११८-११९ | १२) साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृष्ठ संख्या- ६४ |