मुझे जिंदगी अब बुलाती नहीं |
थपकियों से अपनी सुलाती नहीं|
मै बार-बार सोचता हूँ अब उसे,
क्यों खयालों से वो जाती नहीं|
तरसना,तड़पना आदत हो गई,
क्यों वक्त पर दर्शन दिखाती नहीं|
उसकी राह में |बैठा हूँ नजरें लगाये,
वादा करके भी क्यों आती नहीं|
अब तो शायद मुश्किल लगता है,
न उसकी कोई खबर-पाती नहीं |
- विजय