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Thursday, 4 June 2020

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Monday, 27 February 2017

गज़लकार दुष्यंत कुमार की गज़लों में व्यंग्य की तेज-तर्रार धार ... प्रा.विजय लोहार, सहायक प्राध्यापक, मूलजी जेठा महाविद्यालय, जलगाँव. --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- “ दोस्तों !अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है||” १ - दुष्यंत कुमार हिंदी गज़ल विधा के सिरमौर दुष्यंत कुमार की गज़लों में व्यंग्य का दीर्घ स्वर गुंजायमान है| उनकी गज़लें अपने समय के वास्तव से रू-ब-रू करवाती है | व्यंग्य उनकी गज़लों में विशेष आकर्षण निर्माण करता है| वस्तुतः ‘व्यंग्य’ के द्वारा एक रचनाकार मानव और उसके समाज में परिव्याप्त विसंगतियों, विरूपताओं तथा पाखंड का पर्दाफाश करता है| व्यंग्य प्रतिबद्धता का लेखन माना गया है | वह व्यवस्था के प्रतिरोध का असरदार तरीका है| सत्य की अभिव्यक्ति का सटीक मार्ग है | व्यंग्य में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक दोषों को कोई रचनाकार बिना किसी लाग लपेट के मगर तिक्त शब्दों में किसी आईने-सा स्पष्ट कर देता है | व्यंग्य की सबसे तेज-तर्रार और पैनी धार हिंदी गज़लों में दुष्यंत कुमार में प्राप्त होती है | सर्वाधिक मारक एवं परिणामकारक व्यंग्य उनकी ग़ज़लों की प्रमुख विशेषताओं में से एक हैं| स्वातंत्रोत्तर भारतीय परिवेश की दस्तक को दुष्यंत कुमार बड़े संजीदगी के साथ पर व्यंग्य की भाषा में उभारते हैं| उनके भीतर का सजग नागरिक बार-बार व्यवस्था से सीधे-सीधे सवाल पर सवाल करता हैं| शोषण, दीनता, उत्पीडन और वैषम्य दुष्यंत को बहुत गहरे तक कुरेदते हैं| जिसका प्रतिबिंबन उनकी गज़लों में स्पष्टतया देखा जा सकता हैं| डॉ.संतोषकुमार तिवारी लिखते हैं-“ दुष्यंत की मानवीय प्रतिबद्धता प्रारंभ से ही बहुत प्रखर रही है और ‘साये में धूप’ तक वह व्यंग्य की धार बहुत ही पैनी कर चूका है | उनकी गज़लों में शोषण,पराजय, दैन्य, उत्पीडन और दुर्व्यवस्था की निर्भीक अभिव्यक्ति है |” २ दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल संग्रह ‘ साये में धूप ’ हिंदी ग़ज़ल की दुनिया को मिला हुआ नायाब तोअफा है |उसे विद्वानों ने हिंदी ग़ज़ल के मिल का पत्थर माना है | दुष्यंत कुमार वैसे तो नयी कविता के प्रमुख कवियों में से एक माने जाते रहे हैं| परन्तु दुष्यंत कुमार नयी कविता की रूटीन कथ्य बयानी और शिल्प की बोझिलियत से उब- से गए थे| वे अपने भीतर पहले से ही एक शदीद और दुहरी पीड़ा को महसूस कर रहे थे| दुष्यंत अपने समय की तकलीफ़ से जूझ रहे थे, जिसकी अभिव्यक्ति ग़ज़ल जैसी कोमल पर बहुत ही प्रभावी माध्यम से संभव थी | अतः उन्होंने ग़ज़ल लेखन की प्रचलित परिपाटी से हटकर कथ्य की दृष्टि से आम आदमी का जीवन, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं तथा राजीनीतिक विद्रूपताओं को गज़लों में अभिव्यक्त किया| उन्होंने ही हिंदी ग़ज़ल को व्यापक अर्थों में आम आदमी के जीवन से संपृक्त किया है | कमलेश्वर जी ने लिखा है, “ दुष्यंत ने गज़लों को रूमानियत की आदिम गुफाओं से निकालकर सीधे आम आदमी की जिंदगी से जोड़ दिया |” ३ आम आदमी की जिन्दगी झुनझुने-सी बन गई थी, जिसे कोई भी, किसी भी सभा में जैसे चाहे वैसे बजा रहा था | उसका प्रतिरोध दुष्यंत ने अपनी गज़लों द्वारा किया | उनकी बहुतायत गज़लों की अभिव्यक्ति में व्यंग्यरूपी औजार का प्रयोग हुआ है | एक शायर ही देखता है, कहकहों की असलियत हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होती नहीं | बहरहाल, अंतस और बाहरी दोनों तकलीफों को व्यक्त करते-करते उनका कथन बहुत जगहों पर व्यंग्यमय बन गया है| उनका व्यंग्य अभिव्यक्ति कौशल एक प्रतिबद्ध गज़लकार का कौशल है| उनकी प्रतिबद्धता किसी सियासी माहौल से नहीं थी, तो आम इंसान से थी| उनका ग़ज़ल लेखन आम आदमी की रोजमर्रा के जीवन से संबद्ध रहा है | उनकी हर ग़ज़ल आम आदमी की पीड़ा से आप्लावित है| वे कहते भी हैं- “ मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ , हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है ||” ४ दुष्यंत की गज़लों में हिंदुस्तान की दीन-हीन दशा और उसमें बसने वाले करोड़ों आम लोगों की जद्दोजहद का यथार्थ चित्रण मिलता हैं| आज़ाद भारत का मोहभंग उनकी अनेक गज़लों का मजमून बना है | यहाँ साँस लेता हुआ हर व्यक्ति आज़ाद भारत का आज़ाद नागरिक है| देश की आज़ादी अनेक ख्वाबों की सौगात लेकर आई थी | विकास के सपने, गरीबी निर्मूलन के सपने, रोटी-कपड़ा-मकान की आपूर्ति के सपने, सांप्रदायिक सद्भाव के सपने ऐसे कितने ही सारे सपने आँखों में लिए आम आदमी जी रहा था | परन्तु इन सपनों को जल्द ही चकनाचूर होते हुए उसने अपनी स्वप्निल आँखों से देखा | जिससे कि, मनुष्य से प्रतिबद्धता रखने वाला दुष्यंत-सा रचनाकार गहरे तक बेचैन हुआ, उसने व्यंग्य शर को अधिक पैना कर लिखा – “ इस कदर पाबन्दी-ए-मजहब कि सदके आपके, जब से आज़ादी मिली है मुल्क में रमजान है || कल नुमाईश में मिला था वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है||” ५ आज़ादी के बाद हमें एक खुशगवार सफ़र का हक़दार माना गया | लेकिन आज़ाद भारत के मौजूदा हालात के कारण आम-आदमी का जीवन बद से बदतर होता गया | हर जगह विकास की रोशनी होगी, हर घर संपन्न होगा ऐसा बताया गया, मगर हुआ कुछ यों- “ कहा तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए || कहा चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए || न हो कमीज तो पावों से पेट ढँक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए||” 6 मानवता के पक्षधर दुष्यंत ने मानव मूल्यों के विघटन पर असंतोष भी व्यक्त किया है | वे समाज में घटित रोज की अमानवीय हरकतों से आहत होते, उन कारणों की मीमांसा करते रहते| जब उन्हें आदमियों की भीड़ में एक भी कद आदमकद नहीं मिलता, तो जिंदगी का क्या मकसद है ? ऐसा सवाल अपने आप से पूछ बैठते हैं| समाज में आदमी को भुनकर खाने वाली तहजीब की बढ़ोतरी और नालियों में पाए जाने वाले कमल-से कुम्हलाये फूलों (नन्हें बच्चों) को जब देखा गया तो दुष्यंत ने गालियों में ही असर महसूस किया | “ होश में आ गए कई सपने, आज हमने वो खंडहर देखा || नालियों में हयात देखी हैं, गालियों में बड़ा असर देखा ||” ७ उनकी अनेक गज़लों में सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की चाहत व्यक्त हुई है | सांप्रतिक परिवेश की विकृतियों से दुष्यंत बेखबर नहीं थे | समाज का वातावरण किसने मटमैला कर दिया है, इसकी उन्हें पूरी समझ थी| देश के वर्तमान परिस्थितियों की भयावहता उन्हें कचोटती रहती थी | दुर्व्यवस्था, अभाव और शोषणरूपी अंगारों की तासीर को वो अनुभूत कर रहे थे | ऐसे में, देश की सूरत को बदलने के लिए कोई हंगामा खड़ा करना वाजिब था, क्योंकि ऐसे गुजर होने वाली नहीं थी | यह पीर हिमालय सी विशाल बन चुकी थी, अब आवश्यकता थी तो बस परिवर्तन रूपी गंगा निकलने की| दुष्यंत की गज़लों से वह बदलाव की गंगा निकली है | उनका मानना है कि, व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है, बस जरुरत है क्रांति का एक पत्थर कोई तबियत से उछाले |आम आदमी ने भी अपने अधिकारों के लिए शिद्दत से संघर्ष करना चाहिए| अपनी समस्याओं को खुद ही सुलझाना चाहिए| क्योंकि देश के हुक्मरान तो दिल्ली में बैठकर चर्चाओं की दंगल में उलझे हुए हैं | ये लोग तो सियासी दांवपेंचों में देश की अस्मत तक को नीलाम कर रहे हैं| मनसा-कर्मणा कीचड़ से सनी राजनीति पर दुष्यंत सटीक व्यंग्य करते हैं- “ इस सडक पर इस कदर कीचड़ बिछी है, हर किसी का पांव घुटनों तक सना है|| पक्ष औ’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर है, बात इतनी है कि कोई पुल बना हैं ||” ८ सियासतगर्द रहनुमाओं की अदा पर जो दुनिया फिदा है, उसे संभालने की बात दुष्यंत करते हैं| आम आदमी तक सरकारी योजनाएँ पहुंचती नहीं, उसपर भी कुठाराघात करते हैं| यहातक कि,तत्कालीन प्रधानमत्री पर नुकीले व्यंग्य कसते हैं | दुष्यंत जो भी कहते है सच कहते हैं उन्हें रो-रोकर बात कहने की आदत नहीं है | भूख है तो सब्र कहाँ तक करे? क्योंकि जिस दिल्ली ने भूख को बढ़ाया है, वहां पर आदमी के भूख पर हल ढूंढा जा रहा है| आप कितना भी गिडगिडायें पर इनपर असर तो होने वाला नहीं | दुष्यंत आम आदमी को एक नुस्का बताते हैं- “ भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ || आजकल दिल्ली में हैं जेरे बहस ये मुददआ || गिडगिडाने का यहाँ कोई असर होता नहीं, पेट भरकर गालियाँ दो,आह भरकर बद्दुआ ||” ९ दुष्यंत कुमार सभी प्रकार की विषमताओं पर शुब्ध है | फिर वह व्यक्तिगत हो, समाजगत हो, जाति-धर्मगत या अर्थगत इन विषमताओं ने मानव जीवन को दूभर कर रखा है | सिद्धांतहीनता और प्रलोभनवृत्ति के कारण समाज का एक वर्ग वैभव के शिखर पर है तो दीनता-लाचारी के कारण एक वर्ग तंगहाल जिन्दगी बसर कर रहा है| परिस्थिति यह है कि, यहाँ जो वास्तविक हकदार थे वो बाजारों में लुट गए और सारे तमाशबीनों ने दुकाने लगा ली हैं| ऐसे में, दुष्यंत-सा गज़लकार व्यंग्य की जुबान में सच्चाई बयान करता है - “ ऐ रोशनी है हकीकत में एक छल लोगों|| जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों || दरख़्त हैं यहाँ तो परिंदे नज़र नहीं आते, ओ मुस्तहक हैं, वहीँ हक़ से बेदखल लोगों ||” १० दुष्यंत इन विषम नजारों का अँधा तमाशबीन नहीं है| उन्होंने व्यक्ति की दोहरी यातनाओं को भोगा हैं | उनका खून इन विरूपताओं को देखकर खौलता है| अनेक प्रकार के तनाव विभिन्न स्तरों पर महसूस करते हुए उन्होंने व्यंग्य का सहारा लिया है | डॉ.संतोषकुमार तिवारी जी ने लिखा है, “दुष्यंत की संवेदनाएं जन-मन में डूबी हुई है |इसलिए वह सामाजिक अस्तित्व से जुडा हुआ है, आत्मकेंद्रित और अहंनिष्ठ नहीं है |उसमें दिखाऊ आक्रोश और काव्याडंबर नहीं है, बल्कि इंसानी तकलीफों की अभिव्यक्ति की छटपटाहट है |” ११ देश-समाज के साथ ही घर-घर की कहानी को दुष्यंत अभिव्यक्त करते हैं | लोगों के चलन कितने बदल चुके हैं इसका उन्हें पूरा अंदाजा है| वे जब भी रोशनी में आते रहे तो हर तरफ एतराज होता था, क्योंकि इस ग़ज़ल के बन्दे पर किसी सियासी खुदा की इनायत नहीं रही |अपनी एक ग़ज़ल में समकालीन सियासी अदबों (साहित्यकारों) पर और देश बदहाली पर व्यंग्य कसते हैं| “ तुम्हीं से प्यार जताए, तुम्हीं को खा जाए, अदीब यों तो सियासी हैं, पर कमीन नहीं || बहुत मशहूर है आए ज़रूर आप यहाँ, ये मुल्क देखने लायक तो है, हसीन नहीं ||” १२ उक्त विषयों के अलावा उन्होंने व्यक्ति की नैतिक कमियां, सांप्रदायिक विद्वेष, आधुनिक जीवन का भद्दापन तथा सांस्कृतिक अधःपतन आदि पर भी व्यंग्य किया हैं| सारतः स्पष्ट होता है, दुष्यंत की गज़लों में ऐसे कितने ही शेर और अशआर मिल जाते हैं, जिसमें व्यंग्य की तेज-तर्रार धार को देखा जा सकता है | उनकी गज़लें संख्या में काफी कम है, पर है बड़ी असरदार | उन्होंने अनेक विषयों को ग़ज़लों का कथ्य बनाया है| उनमें से अधिकांश गज़लों में व्यंग्य का सफल प्रयोग किया गया है| दुष्यंत प्रतिबद्ध कलमकार थे, न कि काव्याडंबर के निर्माता | उनकी कलम से समय की सच्चाई अंकित हुई | जहाँ भी विसंगती देखी दुष्यंत ने अपनी ग़ज़ल में उसे व्यंग्य प्रहार से लताड़ा | समाज और राजनीति के नंगेपन को खुलकर उघाडा | उनका अपने समय के वास्तव से दो-दो हाथ करना भी उल्लेखनीय विषय है| वे साहसी गज़लकार माने जाते थे| लोग जहाँ अपनी बात करके निष्प्रभ हो जाते, वहां दुष्यंत का क्रांतदर्शी ग़ज़लकार सामने आता ... “ वे मुतमईन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेक़रार हूँ आवाज में असर के लिए ||...... सन्दर्भ :- १) साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृष्ठ संख्या-२७ | २) हिंदी ग़ज़ल:सन्दर्भ और सार्थकता: लेख-डॉ.संतोषकुमार तिवारी, संपा. डॉ.वेदप्रकाश अमिताभ, डॉ.बादामसिंह रावत, पृ.संख्या-११७ | ३) घर का पता, भूमिका- सारिका संपा.कमलेश्वर से उद्धृत | ४) साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृष्ठ संख्या -५७| ५) वहीं | ६) वहीं, पृष्ठ संख्या -१३ | ७) वहीं, पृष्ठ संख्या - ३६ | ८) वहीं, पृष्ठ संख्या - २७ | ९) वहीं, पृष्ठ संख्या - २१ | १०) वहीं, पृष्ठ संख्या- २९ | ११) हिंदी ग़ज़ल:सन्दर्भ और सार्थकता: लेख-डॉ.संतोषकुमार तिवारी, संपा.डॉ.वेदप्रकाश अमिताभ, डॉ.बादामसिंह रावत,पृ.संख्या-११८-११९ | १२) साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृष्ठ संख्या- ६४ |

Monday, 19 December 2016

तुज आहे तुजपाशी... प्रा.विजय लोहार, मूळजी जेठा महाविद्यालय, जळगाव. ९१५८०८२१२८ होते पूर्वी बोलके चेहरे || कोठे गेले साजरे चेहरे || उत्सव येथे मंद जाहले, कोणी मागे सारले चेहरे || आता झाला सारथी तोकडा, आव्हानांनी वाकले चेहरे || तारुण्याचा अविरल प्रवाह कोठे आटला असा आजचा सरळ प्रश्न आहे. तरुणांमध्ये जगाच्या इतिहासाला कलाटणी देवू पाहणारे स्वप्न होते ते कोठे विरले ? आजचा तरुण क्षणोक्षण बदलत असणाऱ्या आव्हानांशी लढण्यास किती व कसा सज्ज आहे हाही सांशक सवाल आहे. नकारात्मक सूर गुंजारीत प्रश्नांची सरबत्ती जरी मांडली असली तरी मी आणि माझ्यासारखे असंख्य लोक युवापिढीप्रती प्रचंड आशावादी आहेत. कारण आम्ही त्यांच्यातील उत्साह व प्रश्नांना भिडण्याची ताकत अनुभवलेली आहे. आधुनिक युगात माणसातील जगण्याच्या व वागण्याच्या पद्धतींमध्ये वेगाने परिवर्तन होत आहे. पूर्वी नव्हत्या तितक्या अधिक व भिन्न प्रकारच्या समस्या उभ्या राहिल्या आहेत.त्यांच्याशी लढण्यासाठी युवापिढीने तयार असले पाहिजे. तरुणांमध्ये आत्मभान व स्वतः सोबतच इतरांच्या सुख-दुःखाची जाण निर्माण झाल्यास विश्व अजुनी सुंदर होवू शकते. त्यांच्यात कधी-कधी मानसिक निराशेतून पोकळी निर्माण होते. भविष्य अंधकारमय असल्याचा साक्षात्कार होतो आणि मग आपण ऐकतो, पाहतो अथवा वाचतो अमुक-तमुकने परीक्षेतील अपयशामुळे, प्रेमभंगामुळे, बेरोजगारीमुळे, आजारपणामुळे, कौटुंबिक कलहामुळे स्वत:ला संपविले. आपल्या दुर्लभ जीवनाचा व निसर्ग शक्तींमुळे सुंदर असलेल्या या विश्वाचा त्याग कोणी कसा बर करू शकतो? त्यांच्यातील संकटांशी लढण्याची अदम्य इच्छाशक्ती कुठे लुप्त होत असते.जगात अशी अनेक उदाहरणे आहेत त्यांनी संकटांशी दोन हात केलेत. प्रत्येक येणारा क्षण यशाचाच असतो असे नाही हे गमक त्यांना उमगले होते. जो चैतन्यमय आणि चिवट आहे तो तरुण स्वतः तरून जावू शकतो व इतरांना सुद्धा तारू शकतो. त्यासाठी आशावाद आपल्या आत साठवून ठेवावा लागतो एखाद्या शिदोरीसारखा. खानदेशी तरुण गझलकार धीरज नवलखे आपल्याला सांगतो..... हारूनी पाहूया, जिंकुनी पाहुया || जीवनाशी जरा खेळुनी पाहुया || लाख काट्यातुनी वाट ही चालली... राहु दे चल तरी, चालुनी पाहुया || चहुबाजूला पसरलेली अनास्था, माणसा-माणसातील अविश्वास आणि सामाजिक मत प्रवाहांच्या प्रचंड गोंधळामुळे आपल्या चैतन्याची धारा मंद झाल्याची पुसटशी कल्पना आली तर तरुणातील तरुणाई प्रचंड आत्मविश्वासाने समाजाचे - देशाचे चित्र पालटू शकते.

Friday, 30 August 2013



   बदलाव

  दरख्तों पर पत्ता रहेगा आखिर कब तक
  हाथों पर हिना का रहेगा  असर कब तक ॥

  उजड़ जाना  है बाग भी एक न एक  दिन
  परिंदा जिंदगी भी  करेगा बसर कब तक ॥

  हर  बदलाव का आना तय है मेरे दोस्तों
  ठहरेगा सीने में क्रोध का बवंडर कब तक ॥

   उनके दिलों में कौन - सी भड़ास पलती है,
   लहू -लुहान होंगे  मासूम शहर कब तक ॥

   अब धीरे -धीरे आसमां  निखरने लगा है
   छाया रहेगा मायूसी का मंजर कब तक ॥


    -    विजय










   

  

Sunday, 4 March 2012