बदलाव
दरख्तों पर पत्ता रहेगा आखिर कब तक
हाथों पर हिना का रहेगा असर कब तक ॥
उजड़ जाना है बाग भी एक न एक दिन
परिंदा जिंदगी भी करेगा बसर कब तक ॥
हर बदलाव का आना तय है मेरे दोस्तों
ठहरेगा सीने में क्रोध का बवंडर कब तक ॥
उनके दिलों में कौन - सी भड़ास पलती है,
लहू -लुहान होंगे मासूम शहर कब तक ॥
अब धीरे -धीरे आसमां निखरने लगा है
छाया रहेगा मायूसी का मंजर कब तक ॥
- विजय