साहित्य प्रतिभा

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साहित्य

Friday, 30 August 2013



   बदलाव

  दरख्तों पर पत्ता रहेगा आखिर कब तक
  हाथों पर हिना का रहेगा  असर कब तक ॥

  उजड़ जाना  है बाग भी एक न एक  दिन
  परिंदा जिंदगी भी  करेगा बसर कब तक ॥

  हर  बदलाव का आना तय है मेरे दोस्तों
  ठहरेगा सीने में क्रोध का बवंडर कब तक ॥

   उनके दिलों में कौन - सी भड़ास पलती है,
   लहू -लुहान होंगे  मासूम शहर कब तक ॥

   अब धीरे -धीरे आसमां  निखरने लगा है
   छाया रहेगा मायूसी का मंजर कब तक ॥


    -    विजय










   

  

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